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सोशल मीडिया पर नकेल
November 25, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

सोशल मीडिया पर नकेल कसना जरूरी

सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है जो इंटरनेट के माध्यम से एक वर्चुअल वर्ल्ड बनाता है जिसे उपयोग करने वाला व्यक्ति पलभर में लाखों लोगों तक पहुंच बना सकता है। इसको सकारात्मक भूमिका का उपयोग किया जाए तो किसी भी व्यक्ति, संस्था, समूह और देश को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध बनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के जरिए ऐसे कई विकासात्मक कार्य हुए हैं जिनसे लोकतंत्र को समृद्ध बनाने का काम हुआ है, देश की एकता, अखंडता, पंथनिरपेक्षता, समाजवादी गुणों में अभिवृद्धि हुई है। अण्णा आंदोलन के पीछे सोशल मीडिया ही था। इसी के सहयोग से ही यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ महाअभियान बना, पूरा देश सड़कों पर उतर आया। सोशल मीडिया के माध्यम से ही निर्भया को न्याय दिलाने के लिए हजारों की तादाद में युवा सड़कों पर आए और सरकार को दबाव में आकर एक नया और प्रभावशाली कानून बनाने पर मजबूर होना पड़ा। 2014 के आम चुनाव के दौरान सोशल मीडिया ने आमजन को मतदान के जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जिससे न केवल वोटिंग प्रतिशत बढ़ा, बल्कि युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के प्रति विश्वास भी जगा। इसी सोशल मीडिया का दूसरा पहलू भी है। जो बहुत खतरनाक है। यहां परोसी जा रही बहुत सी जानकारी भ्रामक होती है। किसी भी तथ्य को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा सकता हैकिसी भी जानकारी का स्वरूप बदलकर उसे आम आदमी को उकसाने वाली बनाई जा सकती है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। यहां कंटेंट का कोई मालिक न होने से मूल स्रोत का अभाव होता है। फोटो या वीडियो की एडिटिंग करके भ्रम फैलाया जाता है। इसी कारण असामाजिक तत्वों द्वारा इसके दुरुपयोग की आशंका रहती है। हमने देखा कि व्हाट्सऐप पर भेजे गए कुछ भ्रामक संदेशों के कारण कई लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। पहले गोरक्षा फिर बच्चा चोरी के नाम पर अनेक निर्दोष लोगों की हत्या हुई। मॉब लांचिंग इसी से निकला हुआ अपराध है। यह कारण है कि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया को लेकर पूरा देश और समाज दुविधा में है। यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि इसका किस रूप में इस्तेमाल किया जाए, इसे किस तरह नियंत्रित किया जाए। दरअसल, भारत जैसे देश में इसके दो छोर हैं। एक तरफ असामाजिक तत्वों द्वारा इसके जबर्दस्त दुरुपयोग की आशंका है और दूसरी और इसके रचनात्मक प्रयोग के लाभ। इसके दुरुपयोग की आशंका को खत्म करने के लिए ही सोशल मीडिया को आधार कार्ड से जोड़ने की चर्चाएं चली। इस मुद्दे को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दायर की गई। ऐसी ही याचिका बॉम्बे और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी हैं। फेसबुक ने इन मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में करने की गुहार लगाई थी। जिस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की बेंच ने कहा कि इस मुद्दे पर जल्द से जल्द निर्णय लेने की जरूरत है। साथ ही कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या सरकार सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कोई दिशानिर्देश तय कर रही है। इधर फेसबुक का कहना है कि किसी थर्ड पार्टी के साथ यूजर्स का आधार नंबर शेयर नहीं कर सकते, इसलिए सोशल मीडिया को आधार कार्ड से नहीं जोड़ा जा सकता। फेसबुक का तर्क दमदार है, लेकिन सोशल मीडिया पर लगाम तो कसनी ही पड़ेगी। दोनों तरह की आशंकाओं का निवारण जरूरी है। हमारा देश जनतंत्र के जिस मुकाम पर पहुंच चुका है वहां ऐसी किसी व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी जा सकती, जो किसी भी तरह से नागरिकों की निजता के अधिकार का उल्लंघन करती हो, इसलिए ऐसा रास्ता निकालना होगा जिस पर किसी भी पक्ष को ऐतराज न हो और सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रम पर भी काबू पाया जा सके।