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साइड पॉकेटिंग से करें अपने डेट फंड की सुरक्षा
November 29, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

इड पॉकेट एक विकल्प है। इसका इस्तेमाल डेट पोर्टफोलियो में जोखिम वाले एसेट को अन्य लिक्विड एसेट से अलग करने के लिए होता है। कुछ फंड हाउस अपनी डेट स्कीमों में साइड पॉकेट का विकल्प शामिल किया है। साइड पॉकेटिंग में अच्छे एसेट को खराब एसेट से अलग किया जाता है। क्या हैं इसके फायदे और नुकसान, एवं इससे डेट फंड की सुरक्षा कैसे की जा सकती है, यहां जानते हैं। दरअसल, बॉन्ड की क्वालिटी का डेट पोर्टफोलियो के क्रेडिट प्रोफाइल पर असर पड़ता है। इस तरीके को अपनाकर छोटे निवेशकों को उस वक्त बचाया जा सकता है जब अचानक बड़े निवेशक स्कीम से पैसा निकालना शुरू कर दें। साइड पॉकेटिंग नेट एसेट वैल्यू (एनएवी) में स्थिरता लाने में मदद करती है। स्कीम से अचानक पैसा निकालने की रफ्तार को रोकती है। साइड पॉकेटिंग से स्कीम की बुनियादी बातों में बदलाव आता है। इसके लिए एसेट मैनेजमेंट कंपनी लिए एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) को स्कीम इनफॉर्मेशन डॉक्यूमेंट (एसआईडी) में बदलाव करना पड़ता है। स्कीम को निवेशकों को बिना एक्जिट लोड चार्ज किए 30 दिन की एक्जिट विंडो देनी पड़ती है। मंजूरी मिलने के बाद एएमसी डिफॉल्ट कैटेगरी में शामिल इंस्ट्रमेंट को दूसरे लिक्विड इंस्ट्रमेंट से अलग कर सकती है। इसके चलते दो स्कीमें बन जाती हैं। एक जिसमें खराब एसेट और दूसरी जिसमें अच्छे इंस्ट्रूमेंट होते हैंनॉन-इनवेस्टमेंट ग्रेड (निवेश लायक नहीं) में तब्दील होने वाले सभी बॉन्डों के लिए सेबी ने साइड पॉकेटिंग को जरूरी नहीं किया है। इस फैसले को लेने का अधिकार एएमसी और उसके ट्रस्टियों के विवेक पर छोड़ा गया है। इस तरह अगर कोई बॉन्ड फिसलकर नॉन-इनवेस्टमेंट ग्रेड में चला जाता है, तो कुछ एएमसी उसकी वैल्यू को बट्टे-खाते में डाल देती हैं। वहीं, दूसरी इसे साइड-पॉकेट करती हैं। क्या साइड-पॉकेटिंग के नुकसान हैं साइड-पॉकेटिंग का इस्तेमाल बड़ी सतर्कता से होना चाहिए। विश्लेषक कहते हैं कि डिफॉल्ट एसेट के वैलुएशन का असर चूंकि अच्छे इंस्ट्रमेंट पर पड़ता है। इसलिए खराब एसेट की वैल्यू का पता लगाना कठिन होता है। निवेशकों को अक्सर दो तरह की एनवीवी को ट्रैक करने में कठिनाई आती है। फंड हाउस को मैनेजरों की फीस बचाने के लिए साइड पॉकेट का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। मान लेते हैं कि एक फिक्स्ड इनकम फंड है जिसका एयूएम 1,000 करोड़ रुपये है। अपने पोर्टफोलियो का 5 फीसदी या 50 करोड़ इस फंड ने उस कंपनी में लगाया जो डिफॉल्ट कर गई। यानी बाकी का 950 करोड़ रुपये अच्छे इंस्ट्रमेंट में है। एक कंपनी के डिफॉल्ट के कारण कई बड़े निवेशक और नुकसान से बचने के लिए अमूमन स्कीम से पैसा निकालने लगते हैं। इन निवेशकों को भुगतान करने के लिए मजबूरन फंड मैनेजर अच्छे बॉन्डों को बेचते हैं, जबकि खराब वाले एसेट स्कीम में बने रहते हैं। कारण है कि इन्हें खरीदने वाले लिवाल बाजार से गम हो जाते हैं। इस स्थिति में पोर्टफोलियो में खराब एसेट की होल्डिंग बढ़ती है। इससे एनएवी में तेज गिरावट आती है। लिहाजा, निवेशकों को नुकसान होता है। इन हालात से बचने के लिए फंड प्रभावित कंपनी के डेट पेपरों (बॉन्ड) को अलग कर देता है, जबकि बाकी के अच्छे बॉन्ड मूल फंड में बने रहते हैं। ओरिजनल फंड के सभी निवेशकों को साइड पॉकेट किए गए फंडों की भी यूनिटें मिलती हैं। जब कभी प्रभावित कंपनी पैसे लौटाती है, निवेशक अपने पैसे पा जाते हैं।