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कसौटी पर योगी सरकार
November 27, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

ढाई साल पहले उत्तर प्रदेश के सत्ता की कमान जब योगी आदित्यनाथ ने संभाली थी तो यह उम्मीद जगी थी कि प्रदेश को अब जातिवाद, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार और माफिया गिरोहों के आतंकवाद से मुक्ति मिलेगी। पर क्या ये अपेक्षाएं पूरी हो पाई हैं? इसमें संदेह नहीं कि अनेक क्षेत्रों में सरकार की शानदार उपलब्धियां हैं। दुनिया के सबसे बड़े कुंभ के मेले का जिस शानदार तरीके से आयोजन किया है उसे प्रदेश ही नहीं बल्कि देश की जनता ने भी सराहा है। जिन योजनाओं के क्रियान्वयन के क्षेत्र में प्रदेश पहले फिसड्डी था अब वह नंबर एक पर आ गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना, गैस कनेक्शन देने की उज्ज्वला योजना और बिजली मुहैया कराने की सौभाग्य योजना को सफलतापूर्वक लागू करके सरकार ने लाखों-करोड़ों गरीबों के घरों को खुशहाल बनाया है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे वनटांगिया, कोल, मुसहर और थारू जनजातियों के विकास के लिए ठोस कदम उठाए हैं। सामूहिक विवाह, सुपोषण से लेकर कन्या सुमंगला जैसी योजनाओं से भी सरकार की लोकप्रियता बढ़ी है। जातिवादी व्यवस्था की जकड़न से सरकार मुक्त हई और माफिया गिरोहों के आतंक पर भी लगाम लगी है, लेकिन आम जनता की समस्याओं के निराकरण के मामले में सरकार को अभी अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सत्ता में आने के तुरन्त बाद भाजपा की सरकार ने प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का अभियान बड़े जोर-शोर से शुरू किया था, लेकिन आज प्रदेश कीसड़कें गड्ढा मुक्त नहीं हो पाई। कानून व्यवस्था के मोर्चे पर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है और भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी विभागों की कार्यशैली में सुधार लाने की जरूरत है। वाराणसी में पीडब्ल्यूडी के एक ठेकेदार की आत्महत्या तो इसकी एक बानगी है। कमीशन का रोग बड़ा गहरा है। पुलिस के कामकाज में सुधार भी एक बड़ी चुनौती है। योगी सरकार के मंत्रियों की संख्या पुनर्गठन के बाद 56 हो गई है। सरकार का लक्ष्य नई गति, ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से कार्यो को आगे बढ़ाना है। अपने मंत्रियों को प्रशिक्षित और नेतृत्व क्षमता को विकसित करने के लिए योगी सरकार भारतीय प्रबंध संस्थान का भी सहयोग ले रही है। योगी आदित्यनाथ की नीति और नीयत पर किसी को भी कोई शंका नहीं है। उनका जीवन बिल्कुल सीधा साधा और पारदर्शिता की मिसाल है। डा. महेन्द्र सिंह, श्रीकांत शर्मा, जयप्रताप सिंह, ब्रजेश पाठक आदि जैसे कुछ मंत्री भी अपने कामकाज को बेहतर तरीके से कर रहे हैं, लेकिन अधिसंख्य मंत्रियों ने अपने कामकाज के तरीके में सरकार की अपेक्षाओं के अनुरूप कोई सुधार नहीं किया है। हालांकि तीन मंत्रियों को बर्खास्त करके बाकी मंत्रियों को सुधरने का संकेत सरकार ने दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि योगी सरकार के खाते में तमाम बड़ी उपलब्धियां भी हैं। नए मेडिकल कालेजों की स्थापना और इंसेफेलाइटिस पर लगाम लगाकर सरकार ने सराहनीय कार्य किया हैइन्द्रधनुष अभियान और आयुष्मान से छूटे 11 लाख परिवारों के लिए सीएम जन आरोग्य योजना के तहत सुविधा देने की व्यवस्था की गई है। कायाकल्प योजना के जरिए प्रदेश के बेसिक स्कूलों की तस्वीर बदली गई है। सरकार को नकल विहीन परीक्षा कराने में सफलता मिली है। पिछले वर्ष फरवरी में सरकार ने लखनऊ में इन्वेस्टर समिट का आयोजन किया था जिसमें 5 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव सरकार को मिले थे। इनमें सवा लाख करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है। 65,000 करोड़ रुपये का निवेश पाइप लाइन में है। यह प्रदेश में बड़े बदलाव का संकेत है। दो तीन घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो प्रदेश की कानून व्यवस्था में बदलाव आया है। माफिया गिरोहों पर लगाम लगी है। कानून व्यवस्था को बेहतर करने से लेकर उद्यमिता को प्रोत्साहन देने जैसी कई चुनौतियां राज्य सरकार के सामने हैं। मुख्यमंत्री के पोर्टल पर की शिकायतें उन्हीं विभागों को वापस भेज दी जाती हैं जिनके खिलाफ शिकायतें होती हैं। लिहाजा उसका कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकला है। योगी सरकार ने पुलिस को खुली छूट देकर उसे और अधिक निरंकुश बना दिया है। योगी सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपराधियों को प्रदेश छोड़ देने को कहा था या फिर जेल जाने के लिए तैयार रहे। पर सरकार अपराधियों में भय नहीं पैदा कर पाई। क्योंकि अपराधी प्रदेश छोड़कर नहीं गए हैं। वे खुलेआम अपराध कर रहे हैं। पुलिस का उन्हें कोई डर नहीं है। यह आरोप भाजपा के विधायक और सांसद लगा रहे हैं। पुलिस वसूली में लगी है। चौराहों पर वाहन चेकिंग के नाम पर लोगों से लूटा जा रहा है। एक तरफ जहां पुलिस से संवेदनशील होने की उम्मीद करते हुए मित्र पुलिस बनने का खाका खींचा जा रहा है, वहीं कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जब पुलिस सुधार की उम्मीदें निराशा में बदल जाती हैं। कुछ ऐसा ही मामला सिद्धार्थनगर जिले के खेसरहा थाना क्षेत्र में सामने आया है, जहां दरोगा और सिपाही ने एक दुकानदार को उसकी मासूम बेटी के सामने बीच चौराहे पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा और मुंह पर जूता रख दिया। हालांकि इसका वीडियो वायरल होने के बाद एसपी ने दोनों को निलंबित कर दिया। जांच सीओ को सौंप दी गई है, लेकिन क्या इस घटना की परिणति महज इतनी भर ही है या इस पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। संयोग से इस घटना का वीडियो बनाकर किसी ने अपलोड कर दिया और यह लोगों के सामने आई। ऐसी अनेक घटनाओं के उदाहरण दिए जा सकते हैं जहां पुलिस का बर्बर चेहरा उजागर होता है। इसलिए सिद्धार्थनगर का मामला महज एक घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह पुलिस महकमे में बिगडैल, अनुशासनहीन, संवेदनहीन, गैरजिम्मेदार और अराजक पुलिसकर्मियों की एक मिसाल है, जो समाज में रक्षक पुलिस का भरोसा जगाने के बजाए उसमें पुलिस के प्रति भय, अविश्वास और आक्रोश पैदा करते हैं। कई पुलिस थानों पर आज भी माफिया गिरोह, गुंडों का राज है। इसलिए पुलिस अपराधियों से तो डरी सहमी नजर आती है और आम जनता का उत्पीड़न करती है। इससे पूरी सरकार की छवि धूमिल होती है। इसलिए सरकार को ऐसे पुलिस कर्मियों पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठाने होंगे। उसे भ्रष्ट और निरंकुश पुलिस कर्मियों पर लगाम और अच्छे पुलिस कर्मियों को प्रोत्साहन देना होगा। इसके लिए उसे आम जनता से मिलने वाली शिकायतों की तय समय में सीबीसीआईडी से जांच कराकर कार्रवाई करने की व्यवस्था बनानी चाहिए

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