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कलंक से मुक्ति
November 28, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

कुपोषण के कलंक से मुक्ति जरूरी

गढ़बो नवा छत्तीसगढ़' अवधारणा वाले छत्तीसगढ़ राज्य के भूपेष बघेल की सरकार ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आगामी जयंती 2 अक्टूबर से प्रदेश में कुपोषण और एनीमिया के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ने का ऐलान किया है। सरकार की मंशा आगामी 3 वर्षों में छत्तीसगढ़ महतारी के माथे से कुपोषण के कलंक को मिटाने की है। आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 5से कम उम्र के 37.60 प्रतिशत यानि लगभग 5 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। 15 से 49 वर्ष की 31.50 प्रतिशत लड़कियां व महिलाएं एनीमिया यानि खन की कमी से जझ रहे हैं। कुपोषण और एनीमिया से जहां देश में लाखों बच्चों की मौत हो रही है, वहीं लाखों बच्चों का वनज जन्म के समय ही कम रहता है, फलस्वरूप उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। आश्चर्यजनक है कि दुनिया के कुल कुपोषितों में से 19 करोड़ से ज्यादा लोग भारत में है तथा बच्चों में कुपोषण का राष्ट्रीय औसत 38 फीसदी है। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में भारत में कुपोषण की दर को बेहद चिंताजनक बताया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले 18 वर्षों में प्रदेश से कुपोषण को खत्म करने में महत्वपूर्ण कामयाबी हासिल की है। राज्य गठन के दौरान साल 2000 में जहां प्रदेश में 70 फीसदी कुपोषण था वहीं अब 2018-19 में यह आंकड़ा 39.60 फीसदी है। प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र बस्तर के सुकमा में सर्वाधिक 45.12 प्रतिषत कुपोषण है जबकि इस क्षेत्र के अन्य जिलों में भी कुपोषण बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। आश्यचर्यजनक रूप से शहरी जिलों बिलासपुर, राजनांदगांव और रायगढ़ में कुपोषण के आंकड़ें चौकाने वाले हैं। दरअसल दुनिया के विकासषील देषों के लिए कुपोषण जनस्वास्थ्य के लिहाज से अहम चुनौती है। प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल्स 'लैंसेट' में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक भारत के उत्तर भारतीय प्रदेशों, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुपोषित बच्चों की तदाद सबसे ज्यादा है। बहरहाल किसी भी देश व समाज का आर्थिक और सामाजिक विकास उसकी बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर होता है, स्वास्थ्य का सीधा संबंध पोषण से है। शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लंबे समय तक नहीं मिलने के कारण ही कुपोषण और एनीमिया जैसी स्थिति निर्मित होती है, परिणामस्वरूप बच्चों और महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है जिससे ये आसानी से कई रोगों का शिकार हो जाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष 2.70 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें से आधे बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं, इसका प्रमुख कारण माताओं में खून की कमी है। भारत में जन्म के बाद जीवित रहने वाले लगभग 53 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं वहीं इस समस्या के कारण हर साल 10 लाख बच्चे मर जाते हैं। गौरतलब है कि दुनिया के एक तिहाई अविकसित बच्चे भारत में ही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में 70 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं इसका प्रमुख कारण उन्हें पर्याप्त संतुलित और पोशक खाद्य पदार्थों का न मिल पाना है। बहरहाल कुपोषण को तीन भागों में विभक्त किया गया है, पहला स्टंटेड ग्रोथ यानि अवरूद्ध विकास, दूसरा वेस्टेड यानि शारीरिक  कमजोरी तथा तीसरा अंडरवेट यानि उम्र के लिहाज से कम वजन होना। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार 5 वर्ष से कम आयु के 38.4 प्रतिशत बच्चों में स्टंटिंग की समस्या थी जबकि 35.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले हैं। 18 प्रतिशत बच्चों का जन्म लेते समय वजन कम था वहीं 5 वर्ष के 58 प्रतिशत बच्चे तथा 14 से 49 वर्ष की आयु के 53 महिलाओं में एनीमिया की समस्या है। इन सभी स्थितियों के लिए मुख्यतौर पर गर्भवती माता और बच्चों को मिलने वाले पोशक आहार में कमी व अन्य बीमारियां जिम्मेदार हैं। बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषक और संतुलित आहार देने में हमारा देश इस कदर पिछड़ा हुआ है कि भारत को वैश्विक कुपोषण का केन्द्र भी कहा जाने लगा है। बहरहाल कुपोषण के कारणों तथा इसे दूर करने के उपायों पर गंभीर विचार आवश्यक है क्योंकि यह सीधे तौर लिए हमारे देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, परिस्थितियों के साथ-साथ भूखमरी, गरीबी, अशिक्षा, अस्वच्छता, रूढ़िवादी असमानता, खाद्य सुरक्षा, कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रमों का सहीं क्रियान्वयन न होना, इन योजनाओं में भ्रष्टाचार तथा पोषक आहारों की गणवत्ता में कमी होना इत्यादि प्रमुख कारण हैं। विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी कुपोशण कमी भी सियासी दलों के लिए राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया जबकि ब्राजील जैसे देश में कुपोषण और भुख को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। भारत में भूखमरी केवल सियासत का मुद्दा ही बनते रहा है, विकास  के तमाम दावों को कुपोषण और भूखमरी की समस्या झुठला रहे हैं। गौरतलब है कि दुनिया की 23 फीसदी भूखमरी भारत में है, ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 103वें स्थान पर है जबकि इसके पहले हम 100वें तथा 2015 में 80वें पायदान पर थे। बहरहाल यह आंकड़ा उस देश का है जहां खाद्य सुरक्षा कानून लागू है तथा जहां लाखों टन अनाज हर साल खुले में सड़ जाते हैं। दरअसल कुपोषण और एनीमिया के लिए सरकार के साथ-साथ समाज भी समान रूप से जवाबदेह है। अशिक्षा और रूढ़िवादी व्यवस्था के चलते महिलाएं अपने आहार में संतुलित पोषक तत्व शामिल ही नहीं कर पा रहे हैं वहीं परिवार वालों के बाद बचे-खुचे खाने से अपनी पेट भरने की प्रवृत्ति ने महिलाओं के सेहत पर भारी असर डाला है। गरीबी, सामाजिक व पारिवारिक कारणों के कारण महिलाओं को आमतौर पर पौष्टिक खाद्य पदार्थ जैसे दूध, घी, अंडा, दाल, हरी सब्जियां, फल इत्यादि सुलभ नहीं हो पाते फलस्वरूप वे एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। अस्वच्छता के चलते भी देश में कुपोषण और एनीमिया के मामले बढ़ रही है, मिड-डे-मील तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों के मिलने वाले भोजन व खाद्य पदार्थों में मिलावट, खराब गुणवत्ता व इस योजना में जारी भ्रष्टाचार कुपोषण मुक्ति अभियान को पलीता लगा रहे हैं। गौरतलब है कि देश और प्रदेश की सरकारें कुपोषण मुक्ति अभियान पर हर साल अरबों रुपए खर्च कर रही हैं, इसके बावजूद नतीजा संतोषजनक नहीं है। केन्द्र सरकार द्वारा बीते साल 2018 में कुपोषण और एनीमिया से निबटने के लिए 9000 करोड़ रुपए की लागत वाले महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय पोषण मिशन कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। इस अभियान से 10 करोड़ लोगों को लाभान्वित होने की उम्मीद है। देश की राज्य सरकारें कुपोषण की समस्या को खत्म करने के लिए तमाम जतन कर रहे हैं, सरकारों को कुपोषण मुक्ति अभियान में अनेक अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संगठनों का सहयोग मिल रहा है। कुपोषण खत्म करने के उद्देश्य से 50 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से गरीब और कुपोषित बच्चों को पौष्टिक भोजन, दूध, फल, अंडा, दलिया इत्यादि परोसा जा रहा है। स्कूलों में मिड-डे-मील जैसी योजनाएं संचालित की जा रही है जिसमें स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है। वहीं छत्तीसगढ़ सरकार ने इस योजना में नाश्ता और अंडा, सोयामिल्क सहित अनेक पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी शामिल किया है। बहरहाल इन योजनाओं के परिप्रेक्ष्य में अहम तथ्य यह भी है कि केवल योजनाओं और कार्यक्रमों के द्वारा ही कुपोषण के कलंक से मुक्ति नहीं मिल पाएगी बल्कि इस दिशा में सरकार के साथसाथ समाज को भी दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करनी होगी। -लेखक, शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं।