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झूठ के फायदे
November 26, 2019 • जगदीश सिकरवार • राज्य व शहर

जब उनका पूरे स्वाभिमान से फर्राटेदार झूठ सुनते-सुनते मुझे उल्टियां आने लगीं तो एक दिन मैंने उनसे कह ही दिया, मित्र!खुदा के लिए अब मुझसे झूठ बोलना बंद कर दो। अब तुम्हारा झूठ-झूठ के सारे रिकार्ड तोड़ने लगा है। अब तो तुम झूठ इतनी सच्चाई से कहने लगे हो कि झूठ के शास्त्र में झूठ की आखिरी हद सफेद झूठ कहीं गई है पर तुम तो उससे भी आगे का झक्कास झूठ बोलने लगे हो। सच पूछं तो दिल से कहना कि तुम्हें अपने इस झूठ पर तनिक भी शर्म महसूस नहीं होती क्या? देख रहा हूं, ज्यों-ज्यों तुम्हारी उम्र बढ़ रही है, त्यों-त्यों तुम मजे से बेपरवाह होकर झूठ बोले जा रहो हो। अब तो झूठ बोलना बंद कर दो हे मेरे दोस्त! जिंदगी में जरा सा सच भी बोल दिया जाए तो आपको भी और सुनने वाले को भी मजा आ गए। मेरे मुंह से ये सुन वे पानी-पानी होने के बदले मेरे आगे दोनों हाथ जोड़े बोले, माफ करना दोस्त! आज तुमने मेरी दुखती रग पर टांग रख ही दी। डियर! आज तुमने मुझे मेरे झूठ बोलने के पीछे के सच को कहने के लिए विवश कर ही दिया तो सुनो! मैं शौक के लिए झूठ नहीं बोलता। मैं भी पहले सच बोला करता था, झूठ सुना करता था। पर बीच में बात ही कुछ ऐसी घटी कि' कह वे सिसकने लगे तो मैंने उन्हें उनकी नाक साफ करने के लिए उनकी जेब से उनका रूमाल निकाल उनकी ओर धर दिया, ऐसी क्या विवशता है तुम्हारी सीना चौड़ा कर झूठ बोलने की दोस्त कि, औरों को तो औरों को, अपने तक को झूठ अपने झूठ बोलने पर उल्टियां आने लगें?'मित्र! मैं बरसों पहले डॉक्टर के पास गया था। तो? उसके पास तो लोग मरने के बाद भी जाते रहते हैं। यह कौन सी नई बात है?' नहीं! मेरा केस जरा और सा है। पहले मैं भी तुम्हारी तरह सच ही बोलता था। तब सच बोलने पर सब मझे गालियां देते थे। मेरा मजाक उड़ाते थे। मैं फिर भी सच बोलता रहा। पर धीरे-धीरे सच बोलने पर मेरा मन भारी रहने लगा। धीरे-धीरे आई फील, मैं गलत रास्ते पर चल रहा हं। धीरे-धीरे मैं समाज में अकेला सा अपने को फील करने लगा। मुझे डिप्रेशन होने लगा। हर समय तनाव में रहता थाआखिर जब मुझे लगा कि मैं सच बोलने के रोग से पल-पल ग्रसित होता जा रहा हूं तो मुझे बचना था शायद तभी, एक दिन मैं हमारे मुहल्ले में फ्री चेकअप कैंप लगे डॉक्टर से मिला तो उसने बहुत देर तक अपना दिमाग खुजलाने के बाद मेरे दिमाग में झांकते पूछा, क्या बीमारी है तुम्हें?' सर! समाज में कटा-कटा सा रहने लगा हूं। चौबीसों घंटे अवसाद में रहता हूं। मुझे पल-पल इंफीरिऑरिटी कांप्लेक्स आ रहा हैसच बोलते होंगे? बुरा मत माना दोस्त! कैंसर से भी खराब बीमारी सच बोलने की होती है। जिसे एकबार लग जाए उसे वो लाइलाज हो जाती है। तो सर! कमाल के डॉक्टर थे वे। बिन नब्ज के ही मेरी बीमारी पकड़ गए। वरना डॉक्टर तो जेब पकड़ने के सिवाय और कुछ करते ही नहीं। 'तो? उन्होंने सलाह दी कि हेल्दी रहने के लिए मैं मौका मिलते ही झठ बोलने की अपनी ही बनाई सीमाएं लांघता रहूं, कह उन्होंने मुझे सच से बचाने के लिए झूठ की तीन-तीन गोलियां दिन में तीन टाइम बिन नागा खाने की सलाह दी। कब तक?'