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घन घमंड नभ..
November 27, 2019 • जगदीश सिकरवार • राज्य व शहर

परिवर्तन प्रकृति का स्वभाव भी है और नियम भी। यह बदलाव अपने साथ कुछ-न-कुछ लेकर आता है और हमें बहुत कुछ देकर जाता है। यही स्वभाव ऋतुओं का भी है। एक ऋतु जाती है और दूसरी आती है। सावन गया। भादों आया। और बीते दिन यह भी चला गया। लेकिन जाते-जाते ये दोनों धरती की कोख में हरियाली के बीज बोते गए। मन की तपती हुई भूमि को संवेदना के जल से सींच गए। सिर्फ प्रकृति के लिए ही नहीं, पानी हमारे लिए भी बहुत जरूरी है। इनसान के भीतर पानी का बचा रहनाबहुत जरूरी है। यही पानी इनसान को इनसान बनाए रखता है। फिर चाहे यह पानी के रूप में हो या शर्म के रूप में। पानी के इस पानीदार रूप का उत्सव है- सावन-भादोंइस ऋतु में प्रकृति अपने हरियाले रूप पर इठलाती हुई दिखती है। प्रकृति के इस रूप को देखकर हमारे भीतर भी कहीं-न-कहीं हरियल कोपलें फटने लगती हैं। बारिश के इस जाते हए मौसम के साथ हमारे 'बारिश उत्सव' की यह अंतिम कड़ी है। प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने अपने व्यंग्य राम का दुख और मेरा' में बारिश को अपने अनोखे अंदाज में देखा है दल गरज रहे हैं और मुझे गोस्वामीजी की यह अर्द्धाली याद आ रही है: घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रियाहीन डरपत मन मोरा।। यों रामचरित मानस में पूरा वर्षा-प्रसंग नीति-शिक्षण का एक बहाना है। राम लक्ष्मण को बाढ़ पर आई क्षुद्र नदी दिखाते हैं और कहते हैं कि इसी प्रकार खल थोड़े धन से ही बौरा जाता है। राम लक्ष्मण को नीति और धर्म में बहलाए रहते हैं, अपने मन में तनिक भी झांकने नहीं देते। केवल यहीं उनकी सावधानी ढीली हुई है, जब वे कह उठते हैं कि चारों ओर मेघ घमंड से गरज रहे हैं और मैं प्रियाहीन हूं तो मेरा मन डरता है। इस अाली का क्या अर्थ है? वैसे पेशेवर रामायणी इसके दस अर्थनिकालेंगे पर उनमें वह हरगिज नहीं होगा, जो तुलसीदास का अभिप्रेय है। एक-एक चौपाई के जब ये कई अर्थ निकालते हैं, तो मेरे मन में आता है कि इनसे कहूं कि भाई, जिसकी बात के एक से अधिक अर्थ निकलें वह संत नहीं होता, लुच्चा आदमी होता है। संत की बात सीधी और स्पष्ट होती है और उसका एक ही अर्थ निकलता है। तुम संत की बात के कई अर्थ निकालकर क्यों अनर्थ करते हो? इनके द्वारा किया गया एक अर्थ यह है- 'प्रियाहीन' का अन्वय यों होगा-प्रिया-अहि-न, याने राम कहते हैं कि हे लक्ष्मण बादल गरजते हैं और मेरा मन डरता है। डर लगता है कहीं प्रिया को इस बरसात में सर्प न काट ले। इस अर्थ से चाहे कथावाचक की आरती की थाली पैसों से भर जाए, पर मेरा समाधान कैसे होगा? सीता दूर है, तो राम का मन डरता क्यों है? क्या इसलिए कि न जाने सीता इस बरसात में कहां है? या इसलिए प्रिया के विछोह से मन कमजोर हो गया? प्रिया पास होने से क्या पुरुष अधिक निडर होता है? लेकिन मेरा पड़ौसी बाबू तो उल्टी बात कहता है-भैया, अपन तो बाल-बच्चेवाले आदमी हैं, डरकर चलते हैं, सबकी सुन लेते हैं। राम की बात राम जानें। बादलों की गर्जन से डरता मैं भी हूं, पर इस डरका कारण जानता हूं और बता भी सकता हूं। नहीं, रामवाला कारण नहीं है। मेरे डरका कारण कोई हरण की गई प्रिया नहीं है, यह मकान है, जिसकी छाया तले बैठा हूं। राम इस भय को नहीं जानते थे। वे किसी किराए के मकान में चतुर्मास काटते तो भाई को ऐसी बातें थोड़े ही सिखाते कि हे लक्ष्मण, पर्वत बूंदों के आघात को ऐसे सह रहे हैं, जैसे संतजन दुष्टों के वचन सहते हैं। वे कहते हैं कि हे लक्ष्मण! मेरे ठीक सिरहाने एक बड़ाटपका है, मुझे रात को नींद नहीं आई। आज ठीक कराना। पर्वत चाहे बूंदों का आघात कितना ही सहें, लक्ष्मण बर्दाश्त नहीं करते। वे बाण मारकर बादलों को भगा देते या मकान मालिक का ही शिरच्छेद कर देते। हमसे न बादल डरता है, न मकान मालिक। और हम एक कोने में दुबके बैठे छत से प्रगट होनेवाली जलधाराओं को देखते रहते हैं। गालिब का मकान भी मेरे ही जैसा रहा होगा। तभी एक चिट्ठी में लिखा है 'आसमां एक घंटा बरसे तो घर दिन भर।' मकान मालिक का अपराध नहीं है। उसने मकान ऐसा बनवाया है कि पानी क्या, हवा तक न घुस सके। एक भी खिड़की नहीं है। अलमारी या ताक भी नहीं है, क्योंकि इनसे दीवार कमजोर होती है। बस दीवारें । हैं और ऊपर पत्थर सीमेंट की छत है। नहीं हैदो हजार वर्ष बाद यह पुरातत्ववेत्ताओं को ऐसा का ऐसा ही जमीन में गड़ा मिल जाएगा। बरामदे में छत को थामे चार विशाल चौकोर स्तंभ खड़े हैं। बड़े मजबूत! ग्रीक पुराणों के एटलस को पता लग जाए तो इन स्तंभों पर आसमान को रखकर तनिक सुस्ता ले। यदि किसी अच्छे पुरातत्ववेत्ता को यह मकान दिख जाए तो वह फौरन निष्कर्ष निकाल ले कि वास्तुकला में मोहनजोदड़ों के खंडहरों से मिलता है और खोदकर यहां जमा दिया गया है। ऐसा शानदार मकान हैपर यह टपकता है। वर्षा के पहले दौर में जब पानी टपका तो सोचा कि इतना सह लेंगे। मकान मालिक से मरम्मत के लिए नहीं कहा। पर ज्यो-ज्यों वर्षा बढ़ी, त्यों-त्यों टपके भी बढ़ते गए। तब हमने मकान मालिक को कष्ट दिया। उसने अपने सामने दो बार सीमेंट का प्लास्टर पुतवाया। हमें बाद में समझ में आया कि यदि वह इतनी दिलचस्पी नलेता और सामने प्लास्टर न कराता, तो पानी तभी बंद हो जाता (तब जरा मोटा प्लास्टर हो सकता था) खैर, उस वक्त तो हम प्रभावित हुए थे। पर जब फिर भी पानी आना बंद न हुआ तो हम सब परेशान हुए कि आखिर पानी आता कहां से है। किसी अखबार को मालूम हो जाता तो वह छाप देता कि भगवान का चमत्कार देखो, पत्थर में से जल-धारा प्रकट हो रही। श्रद्धालुओं की भीड़ के डर से हमने यह चमत्कार प्रकट नहीं होने दिया। हमें याद था कि कुछ ही साल पहले एक भेड़ चरानेवाले लड़के का चमत्कारी बालक के रूप में प्रचार करके पत्रकारों ने लाखों की भीड़ जमा कर दी। वहां हैजा हो गया और कई श्रद्धालु वहीं अंध- विश्वास की वेदी पर बलि हो गए। एक दिन हमने इंजीनियरिंग कालेज से इसी वर्ष डिग्री पानेवाले एक तरुण इंजीनियर को वह चमत्कार दिखाया। उसने ध्यान से जांच कर - कहा, 'ठीक है, समझ गया।ऊपर से प्लास्टर हो ही चुका है। इसमें भीतर से प्लास्टर हो ही चुका है। इसमें भीतर सेसेंधों में सीमेंट और रेत भरवा दीजिए। भीतर से प्लास्टर हो जाने पर एक बूंद नहीं आएगी।' मैं इस युक्ति से प्रभावित हो गया। पर मेरे भाई में व्यवहार-बुद्धि अधिक है। उसने कहा, 'ऐसा करने से दीवारों में पानी घुसता जाएगा और किसी दिन ऊपर दीवार खसक पड़ेगी।' इंजीनियर ने उत्तर नहीं दिया। उसे एक जरूरी काम याद आ गया। मैं समझ गया ज्यों-ज्यों देश में इंजीनियरिंग कालेज खुलते जा रहे हैं, त्यों-त्यों कच्चे पुल और तिड़कनेवाली इमारतें क्यों अधिक बनते जा रहे हैं। और जब हर जिले में इंजीनियरिंग कालेज हो जाएगा, तब हमलोग कहां रहेंगे? किसी ज्ञानी ने हमें एक दिन सांत्वना दी कि इतने परेशान मत हुआ करो। ये किराए के मकान 'कमर्शियल बेसिस' पर बनवाए जाते हैं। व्यावसायिक आधार का सूत्र है- कम लागत, घटिया माल, अधिक दाम। मकान भी दो तरह के होते हैं, रहने के और किराए पर देने के। एक प्रकार के मकान से दूसरे प्रकार का काम नहीं लिया जातारहने का मकान किराए पर नहीं दिया जाता, और किराए के मकान में रहा नहीं जा सकता। व्यावसायिक आधार पर तो हम रोज पिट रहे हैं। एक दिन एक परिचित पधारे। इनके भी दो मकान किराए पर चल रहे थे और इस तरह वे हमारे मकान मालिक की 'मौसी के लड़के' होते थे। सगे नहीं, पर सगे से अधिक याने व्यावसायिक आधार पर। उन्होंने छत को ऊपर से देखा और बोले, 'इसमें प्लास्टर कराना चाहिए।' हमने कहा, 'दो बार तो हो चुका।' वे हंसकर बोले, 'प्लास्टर नहीं हुआ, सीमेंट पोती गई है। मकानवाले से कहो कि मोटा प्लास्टर करवाए।' हमने कहा, 'कितना तो कहा। यहां तक कह दिया कि किसी दिन यह छत गिरेगी, तो हमारी जान चली जाएगी।' यह सुनकर वह दार्शनिक की तरह बोले, 'अपनी जान जाने की बात कहने से काम नहीं चलेगा। यह कहो कि तुम्हारी दीवार गिर जाएगी और तुम्हारा नुकसान हो जाएगा। समझे? तुम देखोगे कि फौरन चार इंच मोटा प्लास्टर हो जाएगा। मकान की मरम्मत कोई तुम्हारी जान बचाने के लिए थोड़े ही की जाएगी, दीवार बचाने के लिए की जाएगी।' व्यावसायिक आधार पर दीवार और मनुष्य के तुलनात्मक मूल्य के सूत्र की हमने गांठ बांध ली। हमने कल जब दीवार गिरने की आशंका मकान मालिक के सामने प्रकट की, तो उसने फौरन नौकर को हुक्म दिया कि पानी खुलते ही अच्छा मोटा प्लास्टर कराना। हम अब पानी खुलने की राह देख रहे हैं। बादल गरज-गरजकर मन कंपा जाते हैं। राम प्रियाहीन थे, इसलिए डरते थे। हम गृहहीन हैं, इसलिए डरते हैंकिसका अभाव बड़ा है?