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गंगा में जीवाणुओं की खोज
November 21, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

जीवनदायी गंगा नदी में उसके उद्गम स्थल गंगोत्री से गंगा सागर तक जीवाणुओं की खोज होगी, जिससे प्रदूषणकारी तत्वों, नदी के स्वास्थ्य पर इन जीवाणुओं के क्या प्रभाव पड़ते हैं, इसका पता चल सके। गंगा का पानी मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा है, इसलिए इसकी सूक्ष्म जीवाण संबंधी विविधता को समझने के लिए जीआइएस मैपिंग की जा रही है। 9.33 करोड़ की लागत का यह अध्ययन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के अंतर्गत 24 माह में पूरा किया जाएगा। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि गंगा नदी के कई क्षेत्रों में जीवाणुओं के संबंध में टुकड़ों में अनेक अध्ययन किए गए हैं, लेकिन पूरी नदी में जीवाणुओं का कोई अध्ययन अब तक नहीं हुआ है। इस अध्ययन में नदी के स्वास्थ्य एवं पुनर्जीवन क्षमता को पारिभाषित करने एवं मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आंकलन किया जाएगा। यह पड़ताल ऐसे समय की जा रही है, जब नदी में जैव विविधता की कमी संबंधी रिपोर्ट सामने आई है। इसमें एक अहम आयाम नदी-जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु की उपस्थिति हो सकता है, जो गंदगी और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। गंगा में वनस्पति एवं जंतुओं की 2000 प्रजातियां उपलब्ध हैं। इनमें से कई प्रजातियां क्षेत्र विशेष में पाई जाती हैं। गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल और मुलायम कवच वाले कछुए इसके विशिष्ट उदाहरण हैं। पाली कीट, सीप एवं घोंघों की कई प्रजातियां समुद्र और गंगा दोनों में पाई जाती हैं। हिलसा मछली पाई तो समुद्र में जाती है, लेकिन प्रजनन के लिए गंगा में आती है___गंगा में जीवाणुओं की तलाश एवं उनकी उपलब्धि नई बात नहीं है। सुपरबग नामक जीवाणु गंगा में पहले ही खोज लिया गया है। इसे मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया है। एंटीबायोटिक रोधी जीन सुपरबग एक प्रकार का जीवाणु है, जो कई बीमारियों के जन्म का कारक है। सुपरबग ने गंगा किनारे बसे शहरों और कस्बों को अपनी चपेट में भी ले लिया है। यह जीवाणु इसलिए ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह दो जीन के संयोग से बना है। हालांकि एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेने वाले सुपरबग के अस्तित्व को लेकर भ्रम की स्थिति है, लेकिन हाल ही में ब्रिटेन के न्यूकैसल विश्वविद्यालय और दिल्ली के वैज्ञानिकों ने गंगा जल पर जो ताजा शोध किए हैं, उनमें दिए ब्योरे गंगा में सुपरबग की उपस्थिति का दावा करने वाले हैं। तय है, गंगा को कचरे के नाले में बदलने वाले उपाय आखिर इसे कब तक निर्मल बनाए रख पाएंगे? गंगा के निर्मलीकरण की महत्वाकांक्षी योजनाएं अब तक थोथी ही साबित हुई हैं, किंतु ताजा सर्वे ने तय किया कहीं ज्यादा ऋषिकेश और हरिद्वार में दूषित हो चुकी है। मसलन गंगा इसके उद्गम स्थल गोमुख से लेकर समापन स्थल गंगासागर तक लगभग सभी जगह मैली हो चुकी

है। यही मैल जीवाणु की उत्पत्ति और उसकी वंश वृद्धि के लिए सुविधाजनक आवास सिद्ध हो रहा है। गंगा में मिले सुपरबग की अलग पहचान बनाए रखने की दृष्टि से इसे बीएलएएनडीएम-1 का नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भविष्य में नए अवतार में भी सामने आ सकता है। इस पर नियंत्रण का एक ही तरीका है कि गंगा में गंदे नालों के बहने और कचरा डालने पर सख्ती से रोक लगाई जाए। सुपरबग के वजूद को लेकर भारत में भ्रम की स्थिति रही है। जब दिल्ली में पहली बार वैज्ञानिकों ने इसकी मौजूदगी जताई थी, तब दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस हकीकत को नकारते हुए दावा किया था कि दिल्ली का पानी शुद्ध व स्वच्छ है और ऐसा महज दहशत फैलाने के मकसद से किया जा रहा है। शोध-पत्र में दावा किया गया था कि कार्बपीनिम दवा से मुठभेड़ करने में सक्षम इस सुपरबग का बहुत छोटे समय विकसित हो जाना आश्चर्यजनक है। कार्बोपीनिम एक एंटीबायोटिक है, जो मल्टी डग प्रतिरोधी दवाओं के संक्रमण के इलाज में प्रयोग की जाती है। हालांकि सुपरबग का भारत या गंगा नदी में पाया जाना कोई अपवाद नहीं है, ये सूक्ष्म जीव दुनिया में कहीं भी मिल सकते हैं। गोमुख से गंगासागर तक गंगा पांच राज्यों से होकर बहती है। इसके किनारे 29 शहर 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले बसे हैं। 23 नगर ऐसे हैं, जिनकी आबादी 50 हजार से एक लाख के बीच है। कानपुर के आसपास मौजूद 350 चमड़ा कारखाने हैं, जो इसे सबसे ज्यादा दूषित करते हैं। 20 प्रतिशत औद्योगिक नाले और 80 प्रतिशत मल विर्सजन से जुड़े परनालों के मुंह इसी गंगा में खुले हैं। यही कारण है कि गंगा का जल जीवन के लिए खतरा बन रहा है। गंगा की गिनती आज दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में हो रही है। साफ है कि गंगा जल परीक्षण के नमूने किसी भी नगर से लिए जाएं, उनके नतीजे भयावह ही आ रहे हैं। 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने गंगा को स्वच्छ बनाने की पहल की थी। यह कार्यक्रम दो चरणों में चला और इन 33 सालों में इस अभियान पर अब तक डेढ़ हजार करोड़ से भी ज्यादा रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन गंगा है कि और ज्यादा मैली होती जा रही है। 2500 किलोमीटर लंबी इस नदी में पुराणों जैसी पवित्रता व शुद्धता कहीं भी नहीं बची है। जबकि केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दे चुकी है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के साथ ही गंगा सफाई का संकल्प लिया, किंतु परिणाम अनुकूल नहीं आए। गंगा हमारे देश में न केवल पेयजल और सिंचाई आदि की जरुरत की पूर्ति का बड़ा जरिया है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आस्था को केंद्र भी है। फिर भी यह दिनोंदिन प्रदूषित होती गई। हमने विकास के नाम पर इस बात की परवाह नहीं की कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों का क्या हश्र होने वाला है? गोमुख से उत्तरकाशी तक 130 किमी के दायरे में पनबिजली परियोजाएं शुरू करके, इसके उद्गम स्थल को ही दूषित कर दिया। इसी का परिणाम उत्तराखंड-त्रासदी था। जाहिर है, प्रकृति के तरल स्नेह का संसाधन के रुप में दोहन करना गलत है। उपभोग की इस वृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए, क्योंकि एक नदी की सांस्कृतिक विरासत में वन, पर्वत, पशु-पक्षी और मानव समुदाय शामिल हैं, इसलिए कचरा बहाकर नदी के निर्मल स्वास्थ्य को खराब किया जाएगा तो उसमें महाजीवाणुओं के पनपने की आशंकाएं बढ़ेगी हीं? लिहाजा गंगा जल में मौजद जीवाणुओं की खोज व पहचान करके जो मानचित्र सामने आएगा, उससे गंगा सफाई अभियान को कोई गति मिलने वाली नहीं है