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भगत सिंह का अनोखापन
November 29, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

भगतसिंह ने छोटे-छोटे आनुशंगिक सवालों को लेकर भी बौद्धिक जेहाद किया था। न्याय व्यवस्था की विसंगतियों की ओर भी ध्यान खींचा था जो आज तक कायम हैं। भगतसिंह अदालतों के सामने नतमस्तक नहीं होते थे। उस वक्त यह कानून था यदि व्यक्ति ने अंग्रेजी वेशभूषा पहने हुए अपराध किया है। तो उसे जेल में बेहतर दर्जा दिया जाएगा। भगतसिंह ने अंग्रेजी वेशभूषा तथा फेल्ट हैट पहने अंसेबली में बम फेंका था। इसलिए उन्हें साधारण कैदियों के मुकाबले बेहतर दर्जा दिया गया। जेल में भगतसिंह ने इसके खिलाफ बगावत की। उन्हें कठोर शारीरिक यातनाएं झेलनी पड़ीं। भगतसिंह की जगह कमजोर कदकाठी का और कोई क्रांतिकारी होता तो मर गया होता। कैदियों को भोजन और सुविधाएं नहीं मिलती थीं। भगतसिंह के आमरण अनशन पर बैठने से वे मिलने लगीं। हिन्दुस्तान की जेलों में नागरिक मूल्यों और अधिकारों की हालत क्या आज भी ठीक है? __सवाल है दुनिया के इतिहास में तेईस, चौबीस वर्ष की उम्र का कोई बुद्धिजीवी भगतसिंह से बड़ा हुआ है? उनकी उम्र का अन्य व्यक्ति भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी और विवेकानन्द भी उस उम्र में नहीं थे। भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है। इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सबसे बडा बुद्धिजीवी अपने आपको कहते हैं। भगतसिंह राष्ट्रवादी देशभक्त परिवार में पैदा हुए थे। भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह विचारक, लेखक और उनके कांग्रेसी पिता सहित देशभक्त नागरिक थे। इसका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा। लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी ने कहा भगतसिंह ने दीमक की तरह पुस्तकें चाटींपहले विश्वयुद्ध के परिणामों का भी भगतसिंह पर गहरा असर हुआ। वह 1928 की राजनीति के मोड़ का बहुत महत्वपूर्ण वर्ष है। 1928 से 1930 के बीच ही कांग्रेस की हालत बदल गई। कांग्रेस केवल पिटीशन या अंग्रेज के जाने की बातें करती थी। उसे मजबूर होकर अर्धहिंसक आंदोलनों में भी अपने आपको झोंकना पड़ा। यह भगतसिंह का कांग्रेस की सियासत की ताकत पर पौरुषपूर्ण प्रभाव था। कांग्रेस का प्रकट या प्रचारित कर्तव्य-चरित्र मुख्यतः भगतसिंह की वजह से बदला। भगतसिंह कांग्रेस के समानांतर एक सक्रिय आंदोलन चला रहे थे। भगतसिंह प्रगतिशील और कुशल जनवादी पत्रकार थे। 'प्रताप', 'किरती', 'महारथी' और 'मतवाला' सहित अन्य पत्र पत्रिकाओं में हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी में भगतसिंह अभिव्यक्त हुए हैं। समाजवाद के पक्ष में भगतसिंह ने बाकी वैचारिकों के समानांतर लकीर खींची। प्रयोजन से भटक कर ऐसा विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को लाभ हो। नहीं कहा जा सकता कि विवेकानंद के विचारों से भगतसिंह परिचित नहीं थे, लेकिन उन्होंने कहीं लिखा नहीं। उन्हें तलाशने की ताब देश को होनी चाहिए। भगतसिंह के लिए राजनीति और धर्म अलग अलग थे। भगतसिंह को अंग्रेज जल्लादों से बचने के लिए अपने केश कटाकर प्रथम श्रेणी के डिब्बे में दुर्गादेवी वोहरा के साथ कलकत्ता तक यात्रा करनी पड़ी। कुछ सिख मतावलम्बियों ने कटाक्ष किया कि पांच धार्मिक प्रतीकों में से केश को क्यों कटवा लिया। भगतसिंह ने धार्मिक जुमले में निरुत्तर किया कि वे भी सिख ही हैं। गुरु गोविंद सिंह का आदेश है अपने धर्म की रक्षा करने के लिए शरीर का अंग अंग कटवा दो। मैंने केश कटवा दिए। मौका मिलेगा तो अगला अंग अपनी गरदन कटवा दूंगा। भगतसिंह का इतिहास को उद्बोधन था कि गरीब के लिए इंकलाब और आर्थिक बराबरी लाने, समाजवाद को साकार करने, देश का निर्माण करने, चरित्र के नये आयाम गढ़ने तथा दुनिया में हिन्दुस्तान का यश रेखांकित करने के लिए मजहबों के अहसान की जरूरत नहीं होनी चाहिए। भगतसिंह की स्मृति को लेकर सब कुछ औपचारिक है। भगतसिंह ने खुद होकर मौत को गले लगाया। यदि असेंबली में बम नहीं फेंकते तो कुछ और समय भी क्रांतिरत रहते। आजादी की अलख जगाते रह सकते थे। उन्होंने सोचा सही वक्त आ गया है जब इतिहास की सलवटों पर शहादत की इस्तरी चलाई जाए। वक्त के तेवर पढ़ने का माद्दा और ताकत होने पर ही कोई इतिहास पुरुष होता है। भगतसिंह ने दुनिया का ध्यान अंग्रेज हुक्मरानों के अत्याचार की ओर खींचा और जानबूझकर असेंबली बम कांड रचा। वे इतिहास की समझ के बहुत बड़े नियंता थे। ऐसे भगतसिंह का ज्यादा चर्चा क्यों नहीं होता? भगतसिंह एक चित्र में चारपाई पर अग्निमय शोलों की दहक को मासूमियत की परत ओढ़े बैठे हैं। ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान बैठा हुआ हैभगतसिंह देश के शायद पहले विचारक हैं जिन्होंने दिल्ली में क्रांतिकारियों के सम्मेलन में कहा था कि सामूहिक नेतृत्व के जरिए ही पार्टी को चलाने का शऊर सीखना होगा। यदि कोई चला भी जाए तो पार्टी नहीं बिखरे क्योंकि व्यक्ति से पार्टी बड़ी होती है और पार्टी से सिद्धांत बड़ा होता है। 1925 में काकोरी प्रकरण में अधिकांश क्रान्तिकारियों के गिरफ्तार हो जाने के बाद भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद जैसे इने गिने क्रांतिकारी जेल से बाहर थे। अपनी अध्ययनप्रियता से तराशे हुए बौद्धिक व्यक्तित्व को लेकर भगतसिंह को इतिहास ने बिखरे हए क्रांतिकारी आन्दोलन को फिर खड़ा करने का अवसर दिया। वर्ष 1928 को लेकर जवाहर लाल नेहरू ने 'आत्मकथा' में लिखा है, 'राजनीतिक दृष्टि से वर्ष 1928 ढेर सी गतिविधियों का पूर्ण वर्ष था। एक नया जोश लोगों को आगे धकेल रहा था। एक नया आन्दोलन जो सबको सराबोर किए हुए था। 1928 के शुरु में हिन्दुस्तान एक सुप्त, निष्क्रिय तथा 1919-1922 की पराजय से नहीं उबरा देश था। 1928 में भारत तरोताजा, सक्रिय तथा ताकत से भरा हुआ मुल्क था।' ऐसे समय जब साधारण लोगों में उत्साह भरा हुआ था, तब दुर्धर्ष क्रांतिनायक भगतसिंह को प्रख्यात अंग्रेज कवि वर्डसवर्थ के फ्रांसीसी क्रांति के दिनों के शब्दार्थों की तरह महसूस होता होगा, 'उस उषाकाल में जीना ही खुशकिस्मती थी लेकिन नौजवान होना तो स्वर्ग के सुख के समान था। नेहरू यह भी कहते हैं कि वर्ष 1928 को इतिहास में युवक आन्दोलनों के सबसे सशक्त गवाह के रूप में याद रखा जाएगा। अर्ध धार्मिक, क्रांतिकारी सभी तरह के युवक संगठनों और उनके कार्यक्रमों का देश में तूफान उमड़ रहा था। ये नवयुवक संगठन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के पक्षधर और प्रवक्ता बने हुए थे। उद्दाम यौवन का यह परिवेश था जिसने युवा और शक्ति से लकदक भगतसिंह को एक ऐतिहासिक अवसर देकर रातों रात दन्तकथाओं का नायक बना दिया।

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