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बेचैनी
November 26, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

हालांकि मैं कवि नहीं हूं, मगर कवि की बेचैनी को समझ सकता हूं। कवि इन दिनों बहुत बेचैन है। बेचैनी में कविताओं पर कविताओं लिखे चला जा रहा है। कवि कविताएं लिखने के अतिरिक्त और कर भी क्या सकता है। यही उसका कर्म है, यही उसकी पूंजीकवि दरअसल अपनी कविताओं से सिस्टम को बदलना चाहता है। मगर सिस्टम इतना नालायक है कि वो बदलकर नहीं देता, वैसा का वैसा ही रहता है। कवि जितना सिस्टम के खिलाफ लिखता है, सिस्टम उतना ही और बिगड़ता जाता है। यह सिस्टम की बड़ी धूर्तता है कि उस पर कवि की कविताओं तक का कोई असर नहीं। जबकि सुना और देखा यही गया है कि कवि की कविताओं ने देश-समाज के भीतर अनेक क्रांतियां ला दी हैं। देश को आजादी दिलाने में कविताओं की बड़ी भूमिका रही है। सत्ता के खिलाफ जब भी खड़े होने की बात होती है, सबसे पहले कवि ही खड़ा होता है। पाश और दुष्यंत ने कितनी ही कविताएं सत्ता-व्यवस्था के विरुद्ध लिखीं। कवि केवल सिस्टम को ही नहीं, वो बहुत कुछ को बदल देना चाहता है। कवि को अच्छी तरह से इल्म है कि देश मंदी की गिरफ्त में है। कवि को यह भी एहसास है कि चालान काटने के नाम पर जनता से दुर्व्यवहार तक किया जा रहा है। कवि जनता है कि लोकतंत्र और संविधान खतरे में है। कवि को अभिव्यक्ति की आजादी की भी फिक्र है। कवि बढ़ती बेरोजगारी से भी परेशान है। कश्मीर के हालात पर भी वो अपनी पैनी नजर रखे हए है। इतने नाजक समय में कवि ने खुद पर ध्यान देना लगभग बंद कर दिया है। वो सिर्फ और सिर्फ कविताएं ही लिख रहा है। बड़ा बोझ उसके कंधों पर है। कवि के कंधों को कमजोर न समझिए। वक्त आने पर वो श्रीकृष्ण की भांति देश की समस्याओं को अपने कंधों पर उठाने का हौसला रखता है। मैं तो कहता हं, देश का प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक व्यक्ति को न होकर कवि को होना चाहिए। मैंने व्यंग्यकार होने से पहले कवि होने का ही मन बनाया था। कुछ कविताएं लिखीं भी थीं, लेकिन कविता में हाथ जमा नहीं तो छोड़ दी। यह तकलीफ मुझे रह-रहकर सताती है कि मैं कवि क्यों नहीं बन पाया। जब किसी क्रांतिकारी कवि को बैखोफ होकर कविताएं लिखते देखता-पढ़ता हूं तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता है। अपने कवि न होने का दर्द मिटता-सा महसूस होता है। कवि जितनी बेचैनी अगर हर किसी के दिलों में पैदा हो जाए तो मेरा दावा है, यह देश रातभर में काया पलट कर लेगा। लेकिन सिस्टम ही कुछ ऐसा है, जिसे दिलेर लोग भाते नहीं। कवि भी जी-जान से लगा है कि वो एक दिन इस सिस्टम को बदलकर ही दम लेगा। वो देश को न केवल मंदी से उबारेगा बल्कि लोकतंत्र को भी बहाल करेगा। तब अभिव्यक्ति का गला भी कोई नहीं दबाएगा। अभी कवि जरूर बेचैन है, लेकिन जल्दी ही वो खुद भी चैन से सोएगा और देश की जनता को भी सोने देगा। वो लगातार प्रयास कर रहा है। मैं उस दिन की प्रतीक्षा में हूं, जब देश पर कवि का राज होगा। सिस्टम बदला हुआ मिलेगाहर तरफ क्रांति का उदघोष होगा। सत्ता फिर कभी किसी कवि से सीधे टकराने का साहस नहीं करेगी