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अयोध्या मामले पर जल्द फैसला आने की उम्मीद
November 27, 2019 • जगदीश सिकरवार • देश- विदेश

  फैसला आने की उम्मीद योध्या में राम मंदिर न केवल करोडों भक्तों की आस्था का विषय OT है, बल्कि वह देश की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। कोई भी देश अपनी संस्कृति की जड़ों से कटकर पहचान नहीं बना सकता और राम भारत की संस्कृति में रचे-बसे हैं। वे भारतीयों के आराध्य ही नहीं, भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत का हर नागरिक फिर वह चाहे किसी भी पंथ से हो, किसी न किसी रूप में राम से भावनात्मक रूप से जुड़ा है। यही कारण है कि देश के करोड़ों लोग बरसों से आयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए प्रयासरत हैं, प्रतीक्षारत हैं। यह मामला कानूनी पेचिदगियों से तो भरा है ही, इसे सियासी फुटबाल भी बनाकर रखा गया है। सामाजिक, राजनीतिक ही नहीं बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी यह काफी संवेदनशील है, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों की वोटबैंक सोच के कारण यह बरसों से अधर में लटकता रहा है। मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और संतों ने आंदोलन चलाए हैं। भारतीय जनता पार्टी का भी यह संकल्प रहा है, लेकिन कभी निचली अदालतों, कभी हाईकोर्ट तो कभी सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सुनवाई चलती और टलती रही। जिसके चलते राम भक्तों में रोष बढ़ता रहा। 90 के दशक में जनभावनाएं इस कदर भड़की की आंदोलनकारियों ने विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया। इसका अलग से केस चल रहा है। ढांचा किसने गिराया, कहां खामी रही, सुरक्षा क्यों नहीं हो पाई, इसका फैसला तो आता रहेगा। जहां तक जमीन के विवाद का मामला है वो भी कई दशकों से अदालतों में हैं। अनेक बार मध्यस्ता के प्रयास हो चुके हैं। हाईकोर्ट फैसला सुना चुका है, लेकिन कुछ लोग, कुछ राजनीतिक दल हैं जो पूरे मामले को धर्म और आस्था से नहीं बल्कि राजनीतिक चश्मे से देखते हैं। इन्हीं लोगों ने अब तक की सुलह-सफाई की सभी कोशिशों को पटरी से उतराने में अहम भूमिका निभाई। 6 अगस्त 2019 से जमीन विवाद मामले की सुप्रीम कोर्ट में लगातार सुनवाई चल रही है। बुधवार को सुनवाई कर रही संवैधानिक बेंच के मुखिया और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 18 अक्टूबर तक दलीलें सुनने की डेडलाइन तय कर दी है। इसके बाद फैसला लिखने में एक महीने का समय लगेगा। चीफ जस्टिस 17 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि वे अपने अवकाश पर जाने से पहले राजनीतिक और सामाजिक लिहाज से इस संवेदनशील मामले पर फैसला करना चाहते हैं। डेडलाइन तय होने से केवल भारत ही नहीं विश्वभर में फैले राम भक्तों को उम्मीद है कि अब जल्द ही इस मामले का निपटारा हो जाएगा और आयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बनेगा। फैसले के बाद भी अगर जरूरत पड़ती है तो सरकार के पास कानून बनाने का विकल्प मौजूद है। सरकार अब तक इस मुद्दे को यह कहकर टालती रही है कि पहले अदालत अपना फैसला सुनाए, उसके बाद जरूरत पड़ी तो सरकार संसद में विधेयक पास करवाकर राम मंदिर निर्माण में आने वाली बाधाओं को दूर करेगी। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद यह विकल्प भी खुल जाएगा। डेडलाइन तय होने से उन राम भक्तों में खुशी का माहौल है जो बरसों से फैसले का इंतजार कर रहे थे। अब उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही भगवान राम का भव्य मंदिर बनेगा। आशा की जानी चाहिए कि इस संवेदनशील मामले में यह अंतिम फैसला होगा, क्योंकि ऐसे मामले लंबे समय तक लटकने से न केवल आस्था पर चोट लगती है बल्कि समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोलने वालों को भी मौका मिल जाता है।